शहडोल।जिले में मनमाना चल रहे क्रेशर,नियमो की उड़ा रहे धज्जियां ,आखिर प्रशासन मौन क्यों ?

जिले में मनमाना चल रहे क्रेशर,नियमो की उड़ा रहे धज्जियां
आखिर प्रशासन मौन क्यों  ?



(दीपक केवट - 7898803849)
शहडोल।मुख्यालय जिला शहडोल में चारो तरफ क्रेसर मालिक मनमाना चला रहे है क्रेसर।न प्रशासन का कोई डर है न नियम की कोई चिंता।कहीं बाउण्ड्रीवाल नहीं तो कहीं पानी का छिड़काव ही नहीं हो रहा है।जिले का खनिज विभाग न तो रेत और कोयले के अवैध उत्खनन और परिवहन को रोक पा रहा है न जिले भर में नियमविरुद्ध ढंग से संचालित होने वाले क्रेशर पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। खनिज विभाग के निक मेपन को कलेक्टर भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। एक लंबे अर्से से यही खेल चल रहा है। इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण विभाग व खनिज विभाग की है लेकिन दोनो विभाग आंखो में पट्टी बांधे बैठे हैं। इस कारण स्थिति में सुधार होता नजर नहीं आर रहा है।
 चूंकि इनके संचालन में पत्थरों की तुड़ाई के समय काफी ध्वनि व डस्ट उत्सर्जित होती है और काफी दूर तक बवण्डर बनकर उड़ती है। इसलिए पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने इनके लिए प्रावधान तय किए हैं जिसका पालन करना जन स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए अनिवार्य माना जाता है। जिले में संचालित क्रेशरों की सं या लगभग 160 बताई गई है, लेकिन यदि प्रशासनिक अधिकारी कड़ाई से इन क्रेशर स्थलों का जायजा लें तो शायद ही ऐसा कोई क्रेशर होगा जहां प्रावधान का पालन होता पाया जाएगा। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की टीम इन क्रेशरों का न तो औचक निरीक्षण करती और न इन पर अंकुश लगाती है।

शासन के दिशा निर्देश
क्रेशर संचालन के लिए शासन ने प्रावधान तय किए हैं। जिसके अंतर्गत पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप क्रेशरों से चूंकि डस्ट निकलती है इसलिए इसका संचालन बस्तियों और शैक्षणिक संस्थाओं से काफी दूर होना चाहिए। डस्ट को कव्हर करने के लिए स्थल पर निरंतर पानी का छिड़काव कराया जाना चाहिए। क्रेशर स्थल के आसपास लगभग 8 फुट ऊंची वाउण्ड्रीवाल होनी चाहिए। क्रेशल स्थल के आसपास पौधे रोपित कराए जाने चाहिए। लेकिन इन सभी प्रावधानों का एक साथ पालन किसी भी क्रेशर में नहीं किया जाता है। स्थिति यह है कि कहीं वृक्षारोपण कराया गया है तो कहीं नहीं कराया गया है। अधिकांश क्रेशर स्थलों में पानी का छिड़काव नहीं कराया जाता है। अधिकांश क्रेशर ऐसे हैं जिनमें बाउण्ड्रीवाल की घेरेबंदी नहीं है। क्रेशर संचालक प्रावधानों पर खरे नहीं उतर रहे हैं इसके बावजूद उन पर नकेल नहीं कसी जा रही है। जमकर गिट्टियों की सप्लाई हो रही है और के्रशर संचालक ताबड़तोड़ मुनाफा कमा रहे हैं तथा पर्यावरण व जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं फिर भी इनकी खबर लेने अधिकारियों को फुर्सत नहीं। जिले में आज तक क्रेशर बंद होते नहीं सुने गए जबकि नए संचालित हो रहे हैं।

पत्थरों का भी हो रहा  अवैध उत्खनन

जिले में क्रेशरों के उपयोग के लिए जमकर पत्थरों का अवैध रूप से उत्खनन किया जा रहा है। डोंगरी व पठारी क्षेत्रों व पहाडियों से अंधाधुंध पत्थर निकाले जा रहे हैं। जिससे धरती का स्वरूप बिगड़ रहा है। पत्थर निकाल कर उनसे गिट्टियां बनाकर उनकी सप्लाई तो कर दी जाती है और क्रेशर संचालकों को धन तो मिल जाता है लेकिन भौगोलिक स्थिति और खनिज राजस्व का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। जिले भर के वनांचलों व राजस्व भूमियों में फैले प्राकृतिक संपदा का दोनो दोनो हाथों से दोहन किया जा रहा है, भारी मशीने संचालित की जा रहीं हैं लेकिन इनकी रोकथाम के लिए उपाय करने और ठोस कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी जा रही है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों की तरह जनप्रतिनिधि भी चुप्पी साधे रहते हैं। आज तक अवैध उत्खनन को लेकर जनप्रतिनिधियों की ओर से न कभी आवाज उठायी गयी और न कभी भी आंदोलन किया गया।

पर्यावरण नियंत्रण विभाग की जिम्मेदारी 
इस मामले में पर्यावरण नियंत्रण विभाग की जिम्मेदारी सर्वाधिक महती और अहम है लेकिन विभाग ने कभी भी क्रेशरों संचालकों के खिलाफ चाबुक नहीं चलाया। उसने केवल औपचारिकता पूरी करने जांच पड़ताल की है और अधिक से अधिक नोटिसें देकर छुट्टी पा लेता है। क्रेशरों की जांच पड़ताल भी साल भर में बहुत कम ही होती है। नतीजा यह होता है कि कई क्रेशर संचालक तो विभाग की नोटिस का जवाब तक नहीं देते हैं और कई तो अधिकारियों को निर्देश पालन करने का आश्वासन देकर छुट्टी पा लेते हैं। अधिकारी यह भी देखने की आवश्यकता नहीं समझते कि किसने जवाब दिया किसने बाद में आश्वासन के अनुरूप प्रावधान का पालन किया और किसने नहीं किया।

लीज की जांच पड़ताल नहीं करते
के्रशर संचालकों ने पत्थरों की खदान के लिए लीज तो ले रखी है लेकिन खनिज विभाग के अधिकारी यह देखने की आवश्यकता नहीं समझते कि पत्थर लीज की एरिया से निकाले जा रहे हैं अथवा उसका उल्लंघन कर इधर-उधर से लाए जा रहे हैं। अधिकांश क्रेशर संचालक जिन रकबों में खदान स्वीकृत की गई है उनसे अलग हटकर पत्थर का उत्खनन कर रहे हैं। स्वीकृति देने के बाद इस बात का भौतिक सत्यापन कभी नहीं किया जाता है कि पत्थर का उत्खनन कहां से किया जा रहा है। इस कार्य में उत्खननकर्ता लीज के रकबे का कहां तक उपयोग किया जाता है। इन सब में सीधे सीधे खनिज अधिकारी की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध है। जिस तरह के कार्यों को खनिज अमला अंजाम दे रहा है ऐसे में तो इस पूरे जिले की प्राकृतिक भूगोल का स्वरूप ही बिगड़ जाएगा। इस पूरे मामले में पर्यावरण विभाग के साथ खनिज अमला बराबर का दोषी है।
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