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चारो तरफ सिर्फ मौत ही मौत है।
आखिर है क्या ये?
क्या ये कुदरत का कहर है या कुछ और ?
आखिर कौन है इसका जिम्मेवार?
ऐसे कितने सवाल है पर जवाब कुछ नही है।
(दीपक केवट/संदीप सोनी - 7898803849)
"प्रकृति का प्रकोप”
मैं इस विषय में कुछ लिखूं इससे पहले मैं कुछ देर तक काफी कुछ सोचता रह गया की लिखूं तो क्या लिखूं। यह विषय इतना भयावह है की लिखने बैठो तो लिखते ही रह जाओ। आज दिनांक हिंदी पंचांग के अनुसार तिथि तेरस माह वैशाख विक्रम संवत २०७७. वाकया कुछ यह है कि अभी हमने कुछ दिन पहले 1 मई को श्रमिक दिवस मनाया ही था कि आज एक हृदय विदारक घटना सुनने को मिली की महाराष्ट्र के औरंगाबाद से कुछ मजदूर मध्य प्रदेश आ रहे थे जिनका रेल की पटरी के चपेट में आने से मौत हो गई। खबर कुछ इस तरीके से सोशल मीडिया में सरक्यूलेट होती रही कि उन मजदूरों को क्या इतना मालूम नहीं था की रेलवे पटरियों पर सोना हादसे को दावत देने जैसा है या हम यह कहले की यह घटना मिसमैनेजमेंट की वजह से हुई। राज्य सरकारें कथित रूप से यह कहती आई है की हम सभी मजदूरों को (जो दूसरे प्रदेशों में फंसे हुए हैं) निकालने का काम कर रहे हैं, फिर ऐसा क्या हुआ कि शहर के बाकि जगह को छोड़ कर उन्होंने सिर्फ रेल की पटरियो को ही सुरक्षित समझने की गलती की। क्या उनमें से कोई उन्हें समझाने वाला नहीं था की रेलवे की पटरी है और गाड़ियो का आवागमन हो सकता है। भाई मजदूर है इतने होशियारी ही होते तो यह हादसा ही नहीं होता ऐसे कुछ तथाकथित लोग कहते हैं जो कि मीडिया में सरक्यूलेट हो रहा है। दरअसल बात यह है कि लॉक डाउन की वजह से श्रमिकों का बडा तबका पलायन होने को मजबूर है क्योंकि अचानक हुए लाकडाउन से इनमें अपने घर जाने की आपाधापी है, गाड़ियों के आवागमन बंद होने से यह स्वयं पैदल घर जाने को मजबूर है। दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी तो ऐसी होती है कि एक आम उच्च उच्च वर्गीय शहरी तबका सोच भी नहीं सकता।इस परिस्थिति को देखते हुए मुझे हिंदी के साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र की रचना "मैं मजदूर हूं" से एक वाक्यांश कोट करता हूं कि "मैं मजदूर हूं जिस दिन कुछ ना करूं उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं है"। कुछ ऐसी स्थिति होती है मजदूरों की इस देश में। इनकी जिम्मेदारी उन राज्य सरकारों की भी थी जहां ये फंसे हुए थे।
यह आज की खबर हुई कल आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से एक और भयावह खबर सुबह सुबह सुनने को मिला था कि वहा किसी केमिकल प्लांट से जहरीली गैस लीक होने की वजह से करीब 400 से 500 लोग प्रभावित हुए और 12 से 15 लोगों की मौत भी हुई है। और काफी जानवरो की भी हवा के संपर्क में आने से मौत हो गई। भाई लोगों को क्या पता था कि सुबह सुबह मॉर्निंग वॉक पर लोगों को स्वच्छ हवा की जगह यह जहरीली गैस सूंघने को मिलेगी और बेहतर स्वास्थ्य की जगह मौत मिलेगी। जब सड़कों पर लासे बिछने लगी, तब प्रशासनिक कुनवा होश में आया। खैर प्रशासन की तरफ से समय रहते एक्शन लिया गया और लोगों को उस जगह से दूर शिफ्ट किया गया लेकिन क्या इस घटना को यह कहकर नकारा जा सकता है कि संबंधित कंपनी के जिम्मेदार लोग की जिम्मेदारी क्या थी, क्या उन्हें यह नहीं पता था गैस चैंबर से गैस लीक हो सकता है और इसकी समय रहते मरम्मत करा ली जाए।
अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं एवं उसके ड्राइवर को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। तब इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या हमने इसी समाज की कल्पना की थी और इस समाज में निहित लोग किस ओर जा रहे हैं हिंसा की ओर या शांति की ओर। कुछ भीड़ द्वारा किसी को पीट-पीटकर मार डालना बहुत बड़ा अपराध है, घटना के घटित होने के बाद इसमें मजहबी एंगल ढूंढा जाता है फिर इसे अपने नैरेटिव के हिसाब से पूरी दुनिया में खबर बनाकर चलाया जाता है। अगर खबर टुकड़े टुकड़े गैंग, लेफ्ट समर्थित या तथाकथित बुद्धिजीवियों के नैरेटिव को सूट करता है तो इसे वह पूरी दुनिया में भारत को बदनाम करने की साजिश के अनुसार चलाते हैं।
प्रकृति का एक और सबसे बड़ा भयानक प्रकोप आजकल पूरी दुनिया झेल रही है यह है चीन के वुहान शहर से फैला कोरोनावायरस जो कि पूरी दुनिया में महामारी के रूप में फैल चुका है, और लाखों लोगों की इस वायरस के संपर्क में आने से मौत हो चुकी है।भारत भी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है लिहाजा वह इससे अछूता रह नहीं सकता। अभी अभी ताजा आंकड़ों के अनुसार करीब करीब १९०० से ज्यादा लोगों की इस वायरस के संपर्क में आने से मौत हो चुकी हैं।
भगवान शिव तांडव कर रहे हैं उन्हें बस अपनी तीसरी आंख खोलने की और देरी है प्रकृति अन्नदाताओं पर भी रहम नहीं दिखा रही कहीं ओले तो कहीं बारिश तो कहीं बहुत तेजी से तूफान। अभी कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में बर्फ के इतने बड़े ओले गिरे कि ऊन पत्थरों से जानवरों की मौत हो गई और जो व्यक्ति उसके संपर्क में आया हुआ भी मर गया,घर की छते टूट गई सीट और टीन की चद्दरो का तो कोई हाल बयां ही नहीं कर सकता, मृत बंदरों की लाशें बिछी हुई थी। यह देश जितना बड़ा है और जितनी ही इसमें एकता में विविधता है उतने ही अजीबोगरीब हादसे यहां देखने को मिलते हैं।
धर्म के नाम पर आतंकवादियों का समर्थन और अलग देश की मांग पर आतंकी गतिविधि, इस देश में शुरुआत से ही यह परंपरा चली आ रही है। और जब सरकारे एवं सुरक्षा बल टोटल एक्शन के मूड में है तब यह खुद को विक्टिम की तरह पेस करते हैं। कोरोना जैसी महामारी से सरकार नागरिकों को बचाने में जुटी है लेकिन एक तबका कोरोनावारियर्स पर हमला करने में फुर्सत ही नहीं, मीडिया का एक धड़ा इन्हें सही एवं दूसरा धड़ा गलत साबित करने में लगा हुआ है। खैर अब ऐसी घटनाएं थोड़ा कम हुई है।
वहरहाल सरकार उन प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाए एवं राहत पैकेज कि उन्हें कोई कमी ना हो, लेकिन हमें कोरोना वायरस से भी सख्ती से निपटना है।
